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कांग्रेस मोदी को टक्कर दे पाएगी या नहीं, बहुत कुछ तय कर देंगे ये इस राज्य के चुनावी नतीजे

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा का कितना असर रहा है वो आने वाले कुछ महीनों में पता चल जाएगा. इसी साल के आखिरी तक कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनाव होने हैं.
साल 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इन चारों राज्यों के चुनावी नतीजे देश की राजनीति की तस्वीर साफ कर देंगे. कांग्रेस के सामने ये वर्ष एक बहुत बड़ी चुनौती तो है ही साथ ही पार्टी पीएम मोदी को टक्कर देने के लायक बची है या नहीं ये भी तय हो जाएगा.

कांग्रेस के इस इम्तिहान की शुरुआत दक्षिण से ही होगी जहां कर्नाटक विधानसभा चुनाव होने हैं. कर्नाटक नतीजे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में मनोवैज्ञानिक असर डाल सकते हैं. इसके साथ ही दक्षिण की 129 लोकसभा सीटों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है.

दरअसल दक्षिणी राज्यों में कर्नाटक एक ऐसा राज्य है जहां बीजेपी और कांग्रेस की सीधी टक्कर होती है. तीसरी ताकत यहां जेडीएस भी है जो कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना चुकी है. लेकिन अब यहां पर बीजेपी की सरकार है और सीएम बसवराज बोम्मई हैं.

इस राज्य में कांग्रेस अगर चुनाव जीतती है तो एक बूस्टर डोज तो मिलेगा ही साथ ही विपक्ष में वो एक बार खुद को मुख्य दल साबित करने का मौका मिल सकता है. कर्नाटक कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का गृह राज्य है. बीजेपी की पूरी कोशिश होगी कि इस राज्य में कांग्रेस को हराकर पूरे राष्ट्रीय नेतृत्व पर सवाल खड़ा कर दिया जाए.

बीजेपी ने राज्य के अपने सबसे वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को 17 फीसदी आबादी वाले लिंगायत समुदाय के लोगों से संवाद स्थापित करने में लगा दिया है. हालांकि येदियुरप्पा ने हाल ही में चुनावी राजनीति से संन्यास की भी घोषणा की है लेकिन पार्टी के लिए सक्रिय रहने की भी बात कही है.

दूसरी ओर बीजेपी ने प्रधानमंत्री मोदी के जरिए विकास कार्यों के प्रचार की रणनीति बनाई है. 12 मार्च को ही पीएम मोदी ने बैंगलुरु-मैसूर एक्सप्रेसवे का उद्घाटन किया है. जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हैं.

लिंगायत वोटरों को लुभाने के लिए बीएस येदियुरप्पा की तैनातगी पर कांग्रेस की ओर से चुटकी भी ली गई है. पार्टी के कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि बीजेपी अभी तक ये फैसला नहीं कर पाई है कि बीएस येदियुरप्पा को उनके भ्रष्टाचार के चलते इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया जाए या फिर प्रधानमंत्री मोदी के हाथों उनका सम्मान कराया जाए.

इसके साथ ही कांग्रेस भी लिंगायतों को लुभाने के लिए आक्रमक रणनीति पर काम कर रही है. पार्टी ने इस समुदाय से आने वाले नेताओं को इसकी जिम्मेदारी दी है. एमबी ,पाटिल, लक्ष्मी हेबालकर, विजयनंद, विनय कुलकर्णी, शिवानंद पाटिल और यशवंत राव पाटिल शामिल हैं.

कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि बीजेपी ने पंचमशाली लिंगायतों का अपमान किया है. इससे लोगों में गुस्सा है. कांग्रेस इस समुदाय से आने वाले लोगों को उचित प्रतिनिधित्व देगी. वहीं कांग्रेस ने प्रदेश पार्टी अध्यक्ष डीके शिवकुमार को वोकालिंगा समुदाय के लोगों को पाले में करने के जिम्मेदारी है. इस समुदाय का कुल आबादी में हिस्सा 14 फीसदी है.

इसके अलावा कांग्रेस की ओर से कुछ कल्याणकारी योजनाओं का वादा भी किया गया है जिसमें गृह लक्ष्मी स्कीम योजना के तहत 1.5 करोड़ महिलाओं को दो हजार रुपये प्रति महीने देने की गारंटी है. गृह ज्योति स्कीम के तहत 200 यूनिट तक फ्री बिजली, अन्न भाग्य योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों के लिए 10 किलोग्राम राशन फ्री देने का वादा किया गया है.

अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए 10 सूत्रीय चार्टर के तहत कई वादे किए गए हैं. तटीय इलाकों के लिए 10 वादे, एक लाख नई नौकरियां पैदा करने के लिए नई कपड़ा इंडस्ट्री लोकलुभावन वादे पार्टी की ओर से किए गए हैं.

कांग्रेस की कोशिश है कि बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का पूरा फायदा उठाया जाए. लेकिन पार्टी के अंदर जारी गुटबाजी एक बड़ी चुनौती है. जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष बीके शिवकुमार के खेमे शामिल हैं.

कांग्रेस आलाकमान इसको लेकर चौकन्ना है. कर्नाटक के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने का कहना है कि राज्य को 40 फीसदी कमीशन वाली सरकार के फंदे से निकालना है. हमारे सभी नेताओं ने अर्जुन की तरह लक्ष्य साध रखा है. इसके साथ ही मल्लिकार्जुन खरगे की छवि हमारे अभियान को मजबूत कर रही है. सुरजेवाला की बातों से साफ है कि वो प्रदेश में पार्टी के अंदर जारी गुटबाजी को ज्यादा तवज्जो न देने की कोशिश कर रहे हैं.

गुटबाजी के अलावा कांग्रेस के सामने राज्य की 17 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी के वोटरों को भी अपने पाले में खींचना है. हिजाब विवाद के दौरान कांग्रेस की ओर से ज्यादा इस पर कुछ भी नहीं बोला गया था. माना जा रहा है इसको देखते हुए मुस्लिम वोटर इस बार जनता दल सेक्युलर जेडीएस की ओर रुख कर सकते हैं. इसकी एक बड़ी वजह ये भी हो सकती है कि जेडीएस ने हाल ही में कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे सीएम इब्राहिम को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है जो कि एक मुस्लिम चेहरा हैं.

कौन हैं लिंगायत
लिंगायत कौन है इसको समझने के पहले हमें हिंदू धर्म के संप्रदायों को जानना होगा. दरअसल हिंदू धर्म में 6 संप्रदाय या शाखाएं हैं. वैदिक, स्मार्त, शैव, वैष्णव, शाक्त और निरंकारी. ये संप्रदाय भी कई भागों में बंटे हुए हैं. लिंगायतों को शैव संप्रदाय की एक उपशाखा वीर शैव का हिस्सा माना जाता है.

लेकिन वीर शैव लिंगायत और लिंगायतों में भी एक फर्क है. वीर शैव शिव के साकार रूप की पूजा करते हैं जबकि लिंगायत शिव के निराकार यानी ईष्ट लिंग की पूजा करते हैं. ये इसका गले में धारण करते हैं और इसके संत भगवा वस्त्र धारण करते हैं.

मान्यता है कि वीर शैव और लिंगायत एक ही हैं. लेकिन लिंगायत समुदाय से आने वाले लोग इसको नहीं मानते हैं.12वीं सदी में बसावेश्वरा नाम के एक समाज सुधारक, दार्शनिक और कवि हुए थे जिन्होंने जाति प्रथा और वैदिक कर्मकांडों को मानने से इनकार कर दिया था. अब उनके समर्थक मानते हैं कि लिंगायत समुदाय का जन्म ही हिंदू परंपराओं के विरोध में हुआ था.

इस समुदाय के संतों का कहना है कि ‘ईष्ट लिंग’ की पूजा करना बसेश्वरा की ओर से सुझाया गया था और इसको हिंदू धर्म से जोड़ना उचित नहीं है. हालांकि इसी समुदाय के कुछ लोग हिंदू धर्म से अलग मान्यता का विरोध करते हैं उनका कहना है कि उस समय विरोध एक तरह का सुधार था जैसे कि भक्ति आंदोलन के समय हुआ था जिसका मकसद हिंदू धर्म को तोड़ना नहीं था.

कर्नाटक की राजनीति में लिंगायतों इतना अहम क्यों?
कर्नाटक में लिंगायत समुदाय आबादी और राजनीति में दखलंदाजी के पैमाने पर बहुत मजबूत है. लिंगायतों की वर्षों से मांग है कि उनको हिंदू धर्म से अलग दर्जा दिया जाए. हिंदू धर्म से अलग करने की मांग लगभगत 40 साल पुरानी है जो कि चुनाव दर चुनाव बढ़ती जा रही है. बहुत से विद्धान इसके पक्ष में हैं इसके साथ ही इस मांग का कई संत भी समर्थन कर रहे हैं.

बता दें कि कर्नाटक की 100 विधानसभा सीटों पर लिंगायत समुदाय के वोटर हार-जीत तय करते हैं. लिंगायत समुदाय का कुल आबादी में 10-17 फीसदी हिस्सा है और इनको ओबीसी कैटेगरी में रखा गया है.

पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्पा भी लिंगायत समुदाय से आते हैं और उनकी वजह से इस समुदाय में बीजेपी की खासी पैठ रही है. साल 2008 में जब कर्नाटक में जब बीजेपी की पहली बार सरकार बनी थी तो उसमें बीएस येदियुरप्पा की सबसे बड़ी भूमिका थी.

लेकिन जब साल 2013 में बीएस येदियुरप्पा ने अलग पार्टी बना ली तो बीजेपी को खासा नुकसान झेलना पड़ गया. पार्टी के पाले से लिंगायत वोटर पूरी तरह से गायब हो गए. इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी.

साल 2018 में यानी लोकसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने ऐलान किया कि लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देने के लिए सिफारिश केंद्र सरकार को भेजेगी. प्रदेश की राजनीति में इसे एक बड़ा गेम चेंजर बताया गया. हालांकि केंद्र सरकार ने इसको मानने से इनकार कर दिया था.

क्या कर्नाटक में भी जातियां तय करती हैं सत्ता?
राज्य की कुल आबादी में लिंगायत समुदाय करीब 18 फीसदी के आसपास है. इनका वोट बीजेपी के पाले में एकमुश्त पड़ता रहा है. दूसरी बड़ी आबादी वोकालिंगा की है जो करीब 14 फीसदी के आसपास है. इस समुदाय के सबसे बड़े नेता पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा हैं. एचडी देवेगौड़ा राजनीति में बहुत सक्रिय नही हैं. लेकिन उनके बेटे कुमारस्वामी फिलहाल अपनी जाति के समर्थन के सहारे राजनीति में ठीक-ठाक दखल रखते हैं. वो एक बार कांग्रेस के समर्थन से सीएम भी रह चुके हैं.

अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग की संख्या 32 फीसदी के आसपास है. हालांकि इस समुदाय का अभी अपना कोई नेता राज्य में नहीं है. हालांकि कुछ चुनावों में बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने यहां सक्रियता दिखाई थी.

कर्नाटक में 17 फीसदी आबादी अल्पसंख्यकों की है जिसमें 13 फीसदी मुसलमान हैं. इसके बाद ईसाइयों की आबादी 4 फीसदी के आसपास है. बीजेपी से बगावत के बाद एक समय बीएस येदियुरप्पा ने लिंगायतों और अल्पसंख्यकों का समीकरण बनाने की कोशिश की थी.

कर्नाटक विधानसभा में दलवार स्थिति
कर्नाटक विधानसभा में 225 सीटें हैं. बीजेपी के पास अभी 117 सीटें हैं. कांग्रेस 69, जेडीएस 32, बीएसपी 1, निर्दलीय 2 हैं. इसके अलावा 1 सीट स्पीकर की है. एक सीट नॉमिनेशन वाली है और 2 सीटें खाली हैं.

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