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एनसीआर में निजी स्‍कूलों के लिए दुधारू गाय बने स्‍कूली बच्‍चे

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली। नया अकैडमिक सेशन 2023-24 के साथ बच्चे नई क्लास में जोश से जा रहे हैं, मगर पैरंट्स फीस के नए बोझ से परेशान हैं। दिल्ली के कई पैरंट्स ने प्राइवेट स्कूलों की शिकायत की है कि स्कूल मैनेजमेंट ने मनमानी फीस बढ़ाई है और कोविड-19 के बाद यह बोझ और बड़ा है। हालांकि, प्राइवेट स्कूलों का कहना है कि फीस जरूरत और नियम के हिसाब से बढ़ाई गई है। कई स्कूल को पिछले सेशन के तहत फीस बढ़ाने की मंजूरी मिली है। हालांकि, शिक्षा निदेशालय के अधिकारियों के मुताबिक, नए सेशन की फीस बढ़ाने के लिए सरकारी जमीन पर बने स्कूलों से अभी प्रस्ताव मांगे गए हैं और इस पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है, ऐसे में नए सेशन की फीस बिना शिक्षा निदेशक की अनुमति के नहीं बढ़ाई जा सकती है। सिर्फ वही स्कूल फीस बढ़ा सकते हैं, जिनके पिछले फीस वृद्धि के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है।

पैरंट्स की बढी टेंशन

अप्रैल आते ही फीस बढ़ोतरी की शिकायतें भी बढ़ने लगी है। कई स्कूलों ने 15%-15% तक फीस बढ़ाई हैं, अभिभावकों से स्‍कूल प्रबंधन का कहना है कि उन्हें शिक्षा निदेशालय ने इजाजत दी है, मगर विभाग का पत्र अभिभावकों को नहीं दिखाया जाता। हमारी लंबे समय से मांग रही है कि निदेशालय को अपनी वेबसाइट में यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए कि किस स्कूल को कितनी फीस बढ़ाने की इजाजत कब से मिली है।

वैसे राजधानी दिल्ली में किसी भी स्कूल को फीस बढ़ाने में मनमानी की इजाजत कानून में नहीं दी गई है। फिर चाहे स्कूल सरकारी जमीन पर बना हो या निजी जमीन पर। ऐसा कहना है एडवोकेट संतोष कुमार त्रिपाठी का जो दिल्ली शिक्षा निदेशालय(DoE) के स्थायी वकील हैं। हालांकि, प्राइवेट स्कूलों की एक्शन कमिटी इससे इत्तेफाक नहीं रखती। उनके मुताबिक, वह उक्त कानून से बंधे स्कूलों के दायरे में नहीं आते। कमिटी ने दावा किया कि प्राइवेट लैंड पर बने स्कूलों को अपने खर्चों को खुद ही पूरा करना होता है, जिसके लिए फीस बढ़ोतरी ही एकमात्र जरिया है। ये दोनों ऐसे वकील हैं, फीस बढ़ोतरी से जुड़े हर कानूनी विवाद में सम्बद्ध विभागों और संगठनों का प्रतिनिधित्व करते आए हैं।

फीस बढ़ोतरी पर एक्सपर्ट की राय

फीस के मुद्दे पर दिल्ली के कानून के बारे में सीनियर एडवोकेट त्रिपाठी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘मॉडर्न स्कूल…’ मामले में साफतौर पर कहा है कि DoE से मंजूरी लिए बिना कोई भी ऐसा स्कूल फीस नहीं बढ़ा सकता, जो सरकारी जमीन पर बना हो। उसी आदेश के अनुसरण में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी ‘जस्टिस फॉर ऑल बनाम दिल्ली सरकार’ मामले में फैसला सुनाया। उस के अनुसरण में शिक्षा विभाग ने कई सर्कुलर जारी कर स्कूलों को निर्देश दिए हैं। 15 मार्च को महावीर मॉडल स्कूल… मामले में हाई कोर्ट के फैसले पर स्पष्टता देते हुए सरकारी वकील ने कहा कि ये स्कूल निजी जमीन पर बने हैं, इसीलिए उनका मामला अलग है। फिर ऐसे स्कूलों का रेगुलेशन कैसे होता है? जवाब में एडवोकेट ने कहा कि दिल्ली एजुकेशन एक्ट एंड रूल्स, 1973 के सेक्शन 17(3) में रूलिंग है कि ऐसा स्कूल अवैध तरीके से या गैर-जरूरी बढ़ोतरी फीस में करता है, तो उसे डायरेक्टर फीस कम करने का निर्देश दे सकता है। लेकिन, यह तभी हो सकता है अगर इस संबंध में उन्हें पैरंट्स या अन्य किसी संबंधित पक्ष से कोई शिकायत मिली हो।

‘फीस बढ़ाने की मंजूरी के दायरे में मात्र 200 स्कूल’

निजी जमीन पर बने स्कूल इस कानून और नियम को दूसरे ढंग से लेते हैं। प्राइवेट स्कूलों की एक्शन कमिटी के एडवोकेट कमल गुप्ता कहते हैं कि फीस बढ़ाने से पहले मंजूरी लेने की बाध्यता से महज 200 स्कूल बंधे होंगे। जबकि, यहां पर एक हजार से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं, जिन्हें इसकी जरूरत नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट के 2015 के एक जजमेंट का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें साफ लिखा है कि स्कूलों को फीस बढ़ाने से पहले अपना प्रस्ताव DoE के सामने रखना होगा, जो नए सेशन की शुरुआत से पहले उस पर फैसला सुना दे तो बढ़िया… और अगर सालों लगाता है तो स्कूलों को इसके इंतजार में बैठे रहने की जरूरत नहीं है। स्कूल नए सेशन से बढ़ी हुई फीस ले सकते हैं। गुप्ता ने कहा कि कानून के साथ प्राइवेट स्कूलों की वास्तविक स्थिति को समझना भी जरूरी है। उन्हें विकास से जुड़े कामों या एजुकेशन के आधुनिक तरीकों और तकनीकों को अपनाने के लिए काफी खर्चा करना होता है।

‘वेबसाइट पर डाली जाए मंजूरी की जानकारी’

दिल्ली में करीब 1700 प्राइवेट स्कूल हैं। सरकारी जमीन पर बने स्कूलों की संख्या 394 है, जबकि 1374 स्कूल प्राइवेट जमीन पर बने हैं। ये स्कूल गैरसहायता प्राप्त हैं, यानी इन्हें सरकार से फंड नहीं मिलता। जस्टिस फॉर ऑल एनजीओ की सेक्रेटरी एवं एडवोकेट शिखा बग्गा बताती हैं, डीडीए या किसी दूसरी सरकारी एजेंसी की जमीन पर चल रहे प्राइवेट स्कूल को हर साल फीस बढ़ाने से पहले शिक्षा निदेशक से इजाजत लेनी होती है। इसमें भी वो स्कूल शामिल हैं, जिनकी लैंड लीज में यह शर्त लिखी है।

वहीं, प्राइवेट स्कूलों के लिए फीस बढ़ाने के लिए मंजूरी लेनी जरूरी नहीं है, मगर फीस बढ़ाने पर जानकारी देनी जरूरी है। अगर निदेशालय को यह गलत लगता है, तो वो इसे रोक सकता है और स्कूल को बढ़ी हुई फीस पैरंट्स को वापस देनी होगी। वह बताती हैं, हमने कोर्ट में याचिका दी थी कि जिन प्राइवेट स्कूलों को फीस बढ़ाने की इजाजत दी जा रही है, उनकी लिस्ट शिक्षा निदेशालय वेबसाइट पर दे, जिस पर निदेशालय ने एफिडेविट फाइल कर कहा है कि वो इस पर काम कर रहा है और जल्द ही इसे ऑनलाइन करेगा। वैसे, निदेशालय ने सरकारी और प्राइवेट जमीन पर बने स्कूलों की लिस्ट वेबसाइट (www.edudel.nic.in) पर दी है।

डिफॉल्टर स्कूल की सोसायटी को लीज डीड कैंसल करने का अनुरोध करेगा एजुकेशन डायरेक्टरेट

शिक्षा निदेशालय के एक अधिकारी का कहना है कि 2023-24 सेशन की फीस बढ़ाने के लिए एजुकेशन डायरेक्टर की मंजूरी के लिए प्राइवेट स्कूल से प्रस्ताव लिए गए हैं। ये वो स्कूल हैं जो सरकारी जमीन पर बने हैं। बिना इजाजत ये प्राइवेट स्कूल फीस नहीं बढ़ा सकते। एजुकेशन डायरेक्टर किसी अधिकारी या टीम के जरिए सभी प्रस्ताव की स्क्रूटनी करवाएंगे। अगर स्कूल फीस बढ़ाने का प्रस्ताव नहीं देता है, तो वो इस सेशन के लिए फीस भी बढ़ा नहीं सकता। बिना इजाजत फीस बढ़ाने की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए ऐसे स्कूलों पर एक्शन लिया जाएगा। साथ ही, डीडीए को डिफॉल्टर स्कूल की सोसायटी को लीज डीड कैंसल करने का अनुरोध किया जाएगा।

कई स्कूलों को मिली है फीस बढाने इजाजत’

अनऐडेड रिकॉग्नाइज्ड प्राइवेट स्कूल्स की एक्शन कमिटी, दिल्ली के प्रेजिडेंट भरत अरोड़ा कहते हैं, ज्यादातर स्कूलों ने फीस सही तरीके से बढ़ाई है। साथ ही, कई स्कूलों की फीस बढ़ोतरी को शिक्षा निदेशालय ने ही मंजूरी दी है। यह मंजूरी 5% से लेकर 18% तक भी है। इसके तहत ही स्कूलों ने फीस बढ़ाई है। अरोड़ा बताते हैं, प्राइवेट स्कूलों को फीस बढ़ाने की जानकारी 31 मार्च से पहले देनी होती है। इसे हर साल स्कूलों को फाइल करना होता है और शिक्षा निदेशक फाइनेंशल, अकाउंट और रिकॉर्ड चेक करवाते हैं। स्कूलों का ऑडिट होता है। इसके लिए स्कूलों को इजाजत नहीं लेनी होती।

आप चाहे तो करवा सकते है स्‍कूल का ऑडिट

किसी भी प्राइवेट स्कूल के स्टूडेंट के अभिभावक अगर स्कूल की बढ़ाई गई फीस या किसी दूसरे चार्ज से परेशान हैं, तो वे उस स्कूल का ऑडिट करवा सकते हैं। इसके लिए दिल्ली सरकार की फीस अनॉमली कमिटी 90 दिन के भीतर शिकायत की जांच करेगी और रिपोर्ट जमा करेगी। शिकायत करने वाले को फीस अनॉमली कमिटी के चेयरपर्सन के नाम पत्र देना होगा, 100 रुपये जमाकर अभिभावक अकेले या ग्रुप में शिकायत कर सकते हैं। इस कमिटी में जिले के डिप्टी एजुकेशन डायरेक्टर चेयरपर्सन होते हैं। हर जोन का एजुकेशन ऑफिसर और उसकी गैरमौजूदगी में जोन का डिप्टी एजकेशन ऑफिसर कमिटी का मेंबर है। इसके अलावा एजुकेशन डायरेक्टर की ओर से नॉमिनेट किया हुआ एक चार्टर्ड अकाउंटेंट इसका मेंबर होगा।

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